
कागजों में ‘जीरो टॉलरेंस’ की सरकार है… लेकिन ज़मीन पर ‘फुल टॉलरेंस’ का खेल चल रहा है। कासगंज के एक किसान की कहानी सिर्फ उसकी नहीं—ये उस सिस्टम की एक्स-रे रिपोर्ट है, जहां न्याय फाइलों में फंसता है और दबंग ट्रैक्टर चढ़ाकर हकीकत लिखते हैं।
एक अकेला किसान… चार दिन से फर्द लेकर दफ्तर-दफ्तर भटक रहा है। उधर, उसकी जमीन पर कब्जा करने वाले दबंग आराम से ‘कानून’ को चाय पिला रहे हैं। सवाल सीधा है—क्या कानून वाकई अंधा है, या आंखें बंद करने का ठेका दे दिया गया है?
मामले की जड़: “खेत से कोर्ट तक की दूरी”
कासगंज के सोरों थाना क्षेत्र का गांव पचलाना… जहां किसान रविंद्र कुमार की जमीन अब सिर्फ कागजों में उसकी है। हकीकत में वहां दबंगों की ‘फसल’ उग रही है—डर, धमकी और कब्जे की।
रविंद्र का आरोप है कि गांव के कुछ दबंग—नत्थू सिंह यादव, दिनेश यादव, ज्वाली और सुरेंद्र—ने उसकी कृषि भूमि पर जबरन कब्जा कर लिया। ये नाम नए नहीं हैं… आरोपों के मुताबिक, इन पर पहले से ही गंभीर धाराएं लग चुकी हैं। यानी रिकॉर्ड भी साफ नहीं और जमीन भी साफ कर दी गई।
पुलिस पर सवाल: “कानून के रखवाले या मौन दर्शक?”
पीड़ित किसान कहता है—“डायल 112 किया, चौकी गया, थाने गया… लेकिन हर जगह बस ‘देखेंगे’ मिला।” सबसे चौंकाने वाला आरोप—पुलिस मौके पर आई, लेकिन कार्रवाई करने के बजाय दबंगों के घर बैठ गई… और फिर चुपचाप लौट गई।
यानी FIR से पहले ‘PR’ हो गया—Public Relation with accused!
ग्राउंड रियलिटी: “चार दिन, चार दफ्तर, शून्य न्याय”
चार दिनों से किसान अपने दस्तावेज लेकर अधिकारियों के चक्कर काट रहा है। हर दरवाजे पर एक ही जवाब—“जांच होगी।” लेकिन सवाल ये है—जब जमीन पर कब्जा दिख रहा है, तो जांच किस बात की? क्या न्याय अब ‘Pending’ में ही मिलेगा?
फर्जी मुकदमों का हथियार: “डराओ, फंसाओ, कब्जा पक्का करो”
पीड़ित का दावा है कि दबंगों ने उसे डराने के लिए दो फर्जी मुकदमे भी दर्ज करा दिए। यानी अब खेल सिर्फ जमीन का नहीं रहा—अब ये ‘कानूनी जाल’ बन चुका है।

लॉ एक्सपर्ट अमित तिवारी का बड़ा बयान
“भारत में भूमि विवाद सिर्फ सिविल केस नहीं होते, ये पावर और सिस्टम के गठजोड़ का सबसे खतरनाक उदाहरण बन चुके हैं। जब स्थानीय पुलिस निष्पक्ष नहीं रहती, तो पीड़ित के पास सिर्फ कोर्ट का लंबा रास्ता बचता है—जो आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ देता है। ऐसे मामलों में तुरंत मजिस्ट्रियल जांच और पुलिस की जवाबदेही तय होना जरूरी है, वरना ‘जीरो टॉलरेंस’ सिर्फ पोस्टर पर रह जाएगा, जमीन पर नहीं।”
“जीरो टॉलरेंस या जीरो एक्शन?”
सरकार कहती है—भूमाफियाओं पर सख्ती होगी। जमीनी हकीकत कहती है—“पहले पहचानिए, कौन माफिया है और कौन पीड़ित?”
यहां तो उल्टा चल रहा है— पीड़ित लाइन में, आरोपी आराम में।
“एक किसान, जो अकेला है… और सिस्टम भी”
रविंद्र कुमार के परिवार में कोई सहारा नहीं—न माता-पिता, न भाई। यानी जमीन ही उसकी जिंदगी है… और वही उससे छीनी जा रही है। उसकी लड़ाई सिर्फ खेत की नहीं—इज़्ज़त और अस्तित्व की है।
अब मामला पुलिस अधीक्षक तक पहुंच चुका है। लेकिन सवाल वही क्या कार्रवाई होगी? या फाइल फिर ‘ठंडे बस्ते’ में जाएगी?
अगर किसान हार गया, तो सिस्टम भी हार जाएगा
कासगंज का ये केस एक जिले की खबर नहीं—ये पूरे सिस्टम का आईना है। अगर यहां न्याय नहीं मिला, तो ‘जीरो टॉलरेंस’ एक जुमला बनकर रह जाएगा।
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